साहित्य युवाओं के बीच आकर्षक का केन्द्र : डॉ. रोहिणी अग्रवाल

 
 

साहित्य युवाओं के बीच आकर्षक का केन्द्र : डॉ. रोहिणी अग्रवाल

        भिवानी। आज भारत देश में आधुनिकता व तकनीकी पहल के क्षेत्र में साहित्य न केवल अपनी अलग पहचान बनाए हुए है अपितु युवाओं के बीच आकर्षण का प्रमुख केन्द्र भी बना हुआ है। ये उद्गार आज आदर्श महिला महाविद्यालय में आयोजित समय की चुनौतियां और साहित्य विषय पर महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय की डीन, उपन्यासकार एवं आलोचक डॉ. रोहिणी अग्रवाल ने व्यक्त किए। व्याख्यान का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर किया गया। डॉ. रोहिणी अग्रवाल ने कहा कि समय के साथ चलने और जड़ता में फंसने से बचना-बचाना साहित्य-सृजन की भी चुनौती है और साहित्य-शिक्षण की भी चुनौती है। सृजन और शिक्षण की चुनौती सांझी है तो इस चुनौती का मुकाबला भी सृजन और शिक्षण के सांझेपन से ही किया जा सकता है। डॉ. अग्रवाल ने विषय सामग्री से संबंधित कहानियों के माध्यम से छात्राओं को उनके अधिकारों के बारे में बताया। उन्होंने छात्राओं को बताया कि अपने बलबूते पर हमें समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी चाहिए। समय के बारे बताते हुए उन्होंने कहा कि छात्राओं को समय पाबंदी में न बंधकर उन व्यक्तियों को पिंजरे में बंद कर देना चाहिए जो समय को खराब करने वाले है। किसानों की वेदना पर भी उन्होंने अपना व्यक्तव्य दिया। डॉ. अग्रवाल ने बताया कि साहित्य रोज रचा जाता है। हमें उपभोक्तावादी न बनकर पाठक बनना चाहिए। व्याख्यान में वरिष्ठ स्त्रीवादी पत्रकार सुश्री गीताश्री ने अपने वक्तव्य का प्रारम्भ अभिव्यक्ति की आजादी पर देते हुए किया। उन्होंने कहा कि साहित्य जगत अभिव्यक्ति की चुनौतियों का सामना कर रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी एक सीमा में बंधकर रह गई है। इस पर सत्ताधारियों द्वारा समय-समय पर संसद में विरोध होते रहे है। यह अभिव्यक्ति की आजादी न केवल सामाजिक खतरों से जूझ रही है अपितु सत्ताधारियों के गले की हड्डी बनकर रह गई है। गीताश्री ने कहा कि साहित्य आम आदमी के बीच में बैठकर लिखा जाना चाहिए। यह मनोरंजन सोहार्द का विषय बनकर नहीं रहना चाहिए। मुम्बई से पधारी वरिष्ठ एवं प्रसिद्ध कहानीकार श्रीमती मधु कांकरियां ने बताया कि साहित्य जीवन की नियमावली है। आज साहित्य-जगत की सबसे बड़ी चुनौती जीवन को बचाने की है। युवा वर्ग के जीवन में केवल एक ही खिडक़ी है वह है सफलता। असफलता का सामना युवाओं के द्वारा किस प्रकार किया जाए यह बताना साहित्य जगत की सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने बताया कि जीवन वह नहीं है जो बड़ा है, जीवन वह है जो सार्थक है। मातृ-ऋण, मातृभूमि ऋण एवं गुरू ऋण जब तक प्रत्येक के द्वारा अदा न कर दिया जाये तब तक अपने जीवन की लीला समाप्त करने का अधिकार स्वयं अपने आप को भी नही है। उन्होंने अपने अनुभव सांझा करते हुए कहा कि आज छात्राओं को निर्भिक होकर नए साहित्य के सृजन की ओर अपना रूख करना चाहिए ताकि विदेशों की छाया में पनप रहे रूढ़ साहित्य का विच्छेद कर सकें। व्याख्यान में पधारी मुख्य वक्ताओं को महाविद्यालय की प्रबंधकारिणी समिति की प्रधान दर्शना गुप्ता द्वारा दादू साहित्य भेंट किया गया। आए हुए सभी अतिथियों का स्वागत प्रबंधक समिति के महासचिव अशोक बुवानीवाला ने किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि यह अत्यंत गौरव की बात है कि संवेदनशील विदूषियां महाविद्यालय के प्रांगण में पधारी। उन्होंन भाव-विभोर होकर तीनों विदूषियों का अभिनंदन किया। कार्यक्रम से पहले प्रधान दर्शना गुप्ता द्वारा लिपिक कार्यालय का उद्घाटन भी किया गया। इस मौके पर हिंदी दिवस पर आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त छात्राओं को पुरस्कृत कर उनका मनोबल बढ़ाया गया। कार्यक्रम में प्रबन्धकारिणी समिति के कोषाध्यक्ष सुंदरलाल अग्रवाल, प्राचार्या डॉ अरूणा सचदेव, हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. उषा गुप्ता, डॉ. मधु मालती, डॉ. इन्दु शर्मा, डॉ. रजनी राघव, अर्पना बत्रा, अनुपम शर्मा, नीलम देवी, गायत्री आर्या, नूतन शर्मा सहित महाविद्यालय की अन्य प्रवक्ता एवं छात्राऐं भी उपस्थित थी।

 

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